Friday, April 29, 2016

धन्य-कलयुग

है अनुयुग समक्ष, सकल संतापी,
त्रस्त सदाशय, जीवन आपाधापी,  
बेदर्द जहां, है अस्तित्व नाकाफी,  
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।   

दिन आभामय बीते, रात अँधेरी,
लक्ष्य है जिनका, सिर्फ हेराफेरी, 
कर्म कलुषित, भुज माला जापी, 
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।  

कृत्य फरेब, कृत्रिम ही दमको,
पातक चरित्र, सिखाता हमको ,   
अपचार की राह है, उसने नापी,
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।      

धूर्त वसूले, हर बात पे अड़कर,
शरीफ़ न पाये, कुछ भी लड़कर ,
व्यतिरेक की आंच, उसने तापी,  
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।  

Thursday, April 28, 2016

मेरे लिए तुम....


मय-साकी-रिन्द-मयखाने में,
आधी भी तुम, पूरी भी हो,  
हो ऐसी तुम सुरा खुमारी,
'मधु' मुस्कान सुरूरी भी हो। 

मंथर गति से हलक उतरती,
नरम स्वभाव, गुरूरी भी हो.     
आब-ए-तल्ख़ होती है हाला,
तुम मद्य सरस अंगूरी भी हो। 
  
जोश नजर शबाब दमकता,  
देह-निखर, धतूरी भी हो,   
खान हो जैसे हीरे की तुम, 
सिर्फ नूर नहीं, कोहिनूरी भी हो। 
  
था जीवन नीरस तब तुम आई ,
 नहीं मांग निरा, जरूरी भी हो,     
अकेली केंद्र बिंदु ही नहीं हो,
तुम मेरे घर की धूरी भी हो।  


Friday, April 15, 2016

तजुर्बा

   

बेशक, तब जा के आया, यह ख़याल हमको,
जब दिल मायूस पूछ बैठा, ये सवाल हमको।


हैं कौन सी आखिर, 
हम वो काबिल चीज़ ऐसी,
करता ही गया ज़माना, जो इस्तेमाल हमको।


लाये तो हम थे किनारे,कश्ती को आँधियों से ,
किन्तु सेहरा सिर उनके चढ़ा, बबाल हमको।


ऐ जिंदगी, तूने हमें यूं सिखाया,जीने का हुनर,
'उदीयमान'* मिला उनको, और ढाल* हमको।


शिद्दत से निभाते रहे हम, किरदार जिंदगी का,
रंगमंच पर मुसन्न* चढ़ा गए, नक्काल हमको।



जाल में जालिम जमाने के, फंसते ही चले गए,
धोखे भी मिले 'परचेत', क्या बेमिसाल हमको।

उदीयमान = प्रगति 
ढाल - ढलान 
मुसंन = जबरदस्ती 


   

मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना !

मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना ! (New concept of 'seating arrangement' in Metro coaches ! ) ...